Saturday, March 5, 2016

'' तुम बिना '' नामक नवगीत , स्व. श्री श्रीकृष्ण शर्मा के नवगीत संग्रह - '' एक अक्षर और '' से लिया गया है -










तुम बिना
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मीत मन के 
गीत जैसे। 

        कल्पना कोमल 
        कि तुम लय से मधुर हो ,
        मीत , छवि के छन्द से भी 
        तुम सुघर हो ,
मन्द्र स्वर ये 
श्लोक निर्झर - नीर - जैसे। 
मीत मन के ...
        धूपिया स्वर्णाभ 
        तन फागुन सँजोये ,
        शब्द हरसिंगार 
        झरते गन्ध बोये ,
जगे होठों पर 
कमल के दीप जैसे 
मीत मन के ...
        तुम मिले तो 
        हुई केसर सृष्टि हर पग ,
        तुम गए तो 
        अन्धसागर हो गया जग ,
तुम बिना हम 
मीत सिर्फ अतीत जैसे। 

मीत मन के।   


                  - श्रीकृष्ण शर्मा 

( कृपया इसे पढ़ कर अपने विचार अवश्य लिखें | आपके विचारों का स्वागत है| धन्यवाद | )
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पुस्तक - '' एक अक्षर और ''  ,  पृष्ठ - 40

sksharmakavitaye.blogspot.in
shrikrishnasharma.wordpress.com

सुनील कुमार शर्मा 
पी . जी . टी . ( इतिहास ) 
पुत्र –  स्व. श्री श्रीकृष्ण शर्मा ,
जवाहर नवोदय विद्यालय ,
पचपहाड़ , जिला – झालावाड़ , राजस्थान .
पिन कोड – 326512
फोन नम्बर - 9414771867



3 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (07-03-2016) को "शिव का ध्यान लगाओ" (चर्चा अंक-2274) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    महाशिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. धन्यवाद मयंक जी |

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  3. धन्यवाद मयंक जी |

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